Akhand Mahayog / अखण्ड महायोग (क्षण एवं सूर्य विज्ञान)
Author
: Gopinath Kaviraj
Language
: Hindi
Book Type
: General Book
Publication Year
: 2012
ISBN
: 9788171248582
Binding Type
: Paper Back
Bibliography
: xviii + 70 Pages, Size : Demy i.e. 21.5 x 14 Cm.

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'अखण्ड महायोग' स्वनामधन्य महातंत्रयोगी महामहोपाध्याय पं० गोपीनाथ जी कविराज की महाकरुणा का अजस्र निर्झर है। यह है उनके मनुष्यत्व की सुगन्धित बयार। अथवा यही है उनकी प्रकृत दार्शनिक वृत्ति का कारणानुसन्धान रूपी तत्त्वदर्शन। इससे ध्वनित होता है वह आप्तोपदेश—जो तत्त्वदर्शी की प्रोज्ज्ज्वल प्रज्ञा में समुद्भासित होकर अखण्ड महायोग के रूप में जन-जन का गन्तव्य पथ अपनी आभा से आलोकित कर रहा है। कविराज जी यथार्थत: क्रान्तदर्शी थे। क्रान्तदर्शी अर्थात् व्यापक दृष्टि सम्पन्न, अतीत एवं अनागत प्रत्यक्ष में समर्थ। कवि अर्थात् 'कविर्मनीषी परिभू: स्वयं?भूÓ। जो देखते हैं, जानते हैं, वे ही कवि हैं। जो प्रकाश करने में समर्थ हैं वे कवि हैं। उनकी काव्यमयी वाणी, आज भी अमरधाम से अपना सन्देश प्रसारित कर रही है। वह सन्देश है 'अखण्ड महायोग' 'अखण्ड महोयग' ग्रन्थ का आलोच्य विषय प्रकारान्तर से सूर्य-विज्ञान है। इस सृष्टि में हमारे ब्रह्मïाण्ड ऐसे करोड़ों सूर्य देदीप्यमान हैं, परन्तु इनमें से कोई भी सूर्य 'आत्मा जगतसस्थुपश्च' नहींं है। सूर्य वस्तुत: आत्मनीन तथा अध्वनीन मौलिक वृत्ति सामंजस्य संस्थापक 'नाभि' है, जहाँ से शक्ति समस्त रचना के अर तथा नेमि को एक विशिष्ट संसस्थान दे रही है। साधना का सामंजस्य समीकरण आज भी ध्रुव तथा पूर्ण समाधान प्राप्त नहीं कर सका है। अतएव बाह्यï विश्व में आज भी शुद्ध सूर्य तत्त्व की उपलब्धि समग्र रूप से नहींं हो पा रही है। महाप्रणव के ऊध्र्वप्रदेश में स्थित बिन्दु जो शैवागम के अनुसार असीम परमेश्वर की बोध रूपी बिन्दुकला है, उसे ही वास्तविक चित् सूर्यदेव का सर्वव्यापी मण्डल माना गया है। यह मण्डल आन्तरिक चिद्भूमिका पर केवल योगीश्वरों द्वारा अनुभवगम्य है, परन्तु वह बाह्यï विश्वभूमिका पर महत्त्म रूप मेंं युगपद् रममाण होने पर भी सर्वजन सुलभ नहीं है। केवल चिद्भूमि पर आरूढ़ योगीगण ही इसका साक्षात्कार कर सकते हैं। साधारण जनमानस के लिये यह तत्त्व सर्वथा अगोचर रह जाता है। कुछ समय पूर्व योगिराजधिराज विशुद्धानन्द परमहंसदेव ने करुणाद्र्र चित्त की अवस्था में (अर्थात् हृदय मेंं करुणा का संचार होने पर जीव जगत के दु:ख से व्यथित होकर) संसार के दु:ख की समस्या के सर्वान्तिक समाधान का जो प्रारूप अन्तर्जगत् में प्राप्त किया था वही है सूर्य विज्ञान अथवा अखण्ड महायोग। उनके अनुसार इस धारा का स्रोत ज्ञानगंज नामक उच्च आध्यात्मिक भूमि से निर्गत होकर उनके माध्यम से जीव जगत की परम-चरम परिणति की दिशा में सतत प्रवहमान है।