Hansa Atmakatha Anka (First Edition 1932) / हंस 'आत्मकथा अंक' (प्रथम संस्करण : 1932)
Author
: Premchand
Language
: Hindi
Book Type
: General Book
Publication Year
: 2010
ISBN
: 9788171246311
Binding Type
: Paper Back
Bibliography
: x + 202 Pages, 10 Plates, Size : Crown Octavo i.e. 25 X 18.5 Cm.

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76 वर्षों बाद विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी द्वारा प्रेमचंद द्वारा सम्पादित 'हंस' के आत्मकथा अंक का पुनप्रकाशन हमारे समय की एक बड़ी साहित्येतिहासिक घटना है। खासकर नई पीढ़ी के लिए, जिसने 'हंस' (प्रेमचंद) नहीं देखा है। प्रेमचंद के सम्पादन में 1930 ई० में बनारस से वसंत पंचमी के दिन कथा मासिक 'हंस' का प्रकाशन हुआ। उनके जीवनकाल में इस पत्रिका के दो महत्त्वपूर्ण विशेषांक निकले—'आत्मकथा अंक' और 'काशी अंक'। इस पत्रिका के लिए उन्हें जुर्माना भरना पड़ा, बल्कि बम्बई जाकर अजंता सिनेटोप में भी काम करना पड़ा ताकि पत्रिका का घाटा पूरा कर सकें। प्रेमचंद द्वारा सम्पादित 'हंस' के आत्मकथा अंक का प्रवेशांक संयुक्तांक जनवरी-फरवरी 1932 में निकला। प्रेमचंद का यह एक नया प्रयोग था और वे चाहते थे कि आत्मकथा के बहाने हम अपने समकालीन साहित्यकारों की निजी जिन्दगी से पाठकों को परिचित कराएँ। 'हंस' के इस अंक में लगभग 52 लेखकों का सहयोग है— विभिन्न विधाओं में। लेकिन अब इस अंक की सात या आठ उल्लेखनीय रचनाओं पर विचार करना ही मेरा अभिप्रेत है। बाबू जयशंकर प्रसाद ने अपनी आत्मकथा कविता में लिखी—''मिला कहाँ वह सुख जिसका मैं स्वप्न देखकर जाग गया/आङ्क्षलगन में आते-आते मुसक्याकर जो भाग गया।' आलोचक पं० रामचन्द्र शुक्ल ने 'प्रेमघन की छाया-स्मृति' जैसा संस्मरण लिखा जिससे पता चलता है कि प्रेमघन के प्रति उनकी कितनी श्रद्धा थी। बाबू शिवपूजन सहाय ने अपने बारे में तो नहीं लिखा लेकिन कलकत्ता से निकलने वाली पत्रिका 'मतवाला' की आत्मकथा जरूर लिख दी—'मतवाला कैसे निकला'। सम्भवत: 'मतवाला' के प्रकाशन के बारे में इससे ज्यादा प्रामाणिक जानकारी अन्यत्र उपलब्ध नहीं है। डॉ० धीरेन्द्र वर्मा की डायरी के पृष्ठ तो जैनेन्द्र कुमार की आध्यात्मिकता के पूर्वरंग लिये हुए हैं। इसी तरह पं० केदारनाथ पाठक का लेख 'आचार्य द्विवेदीजी तथा सरस्वती' के साथ जैनेन्द्र कुमार के गाँधी के साथ कश्मीर यात्रा के अनुभवों पर भी गौर करने की जरूरत है। शिवरानी देवीजी की 'मेरी गिरफ्तारी' और पं० राधेश्यामजी कथावाचक का 'मेरा नाटकीय और उसके अनुभव' भी महत्त्वपूर्ण हैं। मुंशी अजमेरी का लेख 'महात्माजी के चरणों में और अन्त में प्रेमचंद का लेख—'जीवनसार' तो अनमोल है जिसका उपयोग मदनगोपाल ने 'प्रेमचंद की आत्मकथा' लिखने में किया और अमृतराय ने 'प्रेमचंद : कलम का सिपाही' में। इस पत्रिका के पुराने ऐतिहासिक अंक का प्रकाशन इस दृष्टि से उल्लेखनीय है कि तमाम विवादों के बावजूद इसी अंक से हिन्दी में आत्मकथा और संस्मरण लिखने की परम्परा की जमीन पुख्ता होती है। इसके प्रकाशन के बारे में सबसे अच्छी बात है कि उसी पुराने टाइप, सम्भवत: कागज भी और कलेवर और साज-सज्जा के साथ इसे प्रकाशित किया गया है। जब यह अंक छपा था 1932 में इसका मूल्य सवा रुपये था, 76 वर्षों बाद सिर्फ 180 रुपये, जो महत्त्व की दृष्टि से बहुत कम है। यह योजना स्व० पुरुषोत्तमदास मोदी की थी। इसकी संक्षिप्त भूमिका उन्होंने लिखी है। इसलिए उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना मुझे जरूरी लगता है। —भारत भारद्वाज