Bharatiya Sangrahalaya Evam Jansampark / भारतीय संग्रहालय एवं जनसम्पर्क
Author
: Dr. R. Ganeshan
Language
: Hindi
Book Type
: Reference Book
Publication Year
: 2002
ISBN
: 8171243010
Binding Type
: Paper Back
Bibliography
: xxiv + 296 + 48p. Illus., Biblio., Size : Demy i.e. 22.5 x 14.75 Cm.

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INDIAN MUSEUMS have a long way to go in developing themselves as dynamic reference-centres, popular educators, fully responsive to the needs and aspirations of the societies around them. They have remained much the same as when they were started in the 19th century by the British Government Collections of artefacts researched by the scholarly few. People at large still view them as only storehouses of curiosities not of relevance to their daily activities. In the present age the learning connected with museums has made great stride. But knowledge of these advances is to be had only from journals and publications in English and other European languages and remains difficult of access to Indian readers. The author, working in Bharat Kala-Bhawan, Benares Hindu University, says he has written this book to supply the felt need in the people’s language to up-date their knowledge suggesting the ways and means of development of Indian museums.

आदिकाल से ही भारतीय जनमानस 'सत्यम् शिवम् सुन्दरम्Ó की अवधारणा से ओतप्रोत रहा है, जो भारतीय संस्कृति का मूल आधार है। इसी अवधारणा से प्रेरित होकर पूर्वज संस्कार सम्पन्न अतिश्रेष्ठï मानवों ने अपनी सृजनात्मक क्षमता एवं कला-कौशल द्वारा संस्कृत के बहुआयामी पक्षों को समृद्ध किया है जिनके अवशेष स्वरूप वास्तविक मूर्त वस्तुयें आज भी जनसामान्य की प्रेरणा स्रोत बनकर विविध सांस्कृतिक आगारों, संग्रहालयों में संरक्षित हैं। इन संग्रहों के सारगॢभत ज्ञान से समुदाय को शिक्षित,जागरूक बनाने की दिशा में भारत में अब तक कोई सार्थक प्रयत्न नहीं हुआ है। यही कारण है कि भारत की बहुसंख्यक जनता इन सांस्कृतिक तत्त्वों का लाभ पाने में असमर्थ है। आज की तकनीकी एवम् औद्योगिक विकास में हो रही तीव्रगामी प्रगति; जिसे आधुनिक विकास प्रक्रिया का अभिन्न अंग माना जा रहा है, के फलस्वरूप भारत की सांस्कृतिक परम्पराओं का विखण्डन भी साथ ही साथ होना प्रारम्भ हो चुका है। आज हमारा समाज संस्कृतिविहीन विकास की ओर उन्मुख होता जा रहा है। ऐसी दुरावस्था में देश के विविध संग्रहालय एवं सांस्कृतिक आगार ही कला एवं संस्कृति का सम्बन्ध लोक से करा सकेंगे। जीवन को उससे ओत-प्रोत कर सकेंगे। उन्नत सांस्कृतिक परिवेश हेतु मार्ग प्रशस्त कर सकेंगे। वर्तमान परिदृश्य में यह दुरूह कार्य एक सुनियोजित प्रचार एवं जनसम्पर्कीय विधा द्वारा ही सम्भाव्य है। इसी दृष्टिïकोण से डॉ० गणेशन् द्वारा लिखित भारतीय संग्रहालय एवं जनसम्पर्क पुस्तक की अभिप्रायपूर्ण प्रासंगिकता है जिसमें विविध स्रोतों से प्राप्त एकत्रित सामग्रियों, प्रमाणों का सूक्ष्मता से विश्लेषण कर दिया गया यथोचित निर्देश, प्रस्ताव एवं सुझाव है जो इनके व्यक्तिगत अनुसंधान का परिणाम है। विगत कई वर्षों से एक ऐसी पुस्तक की नितान्त आवश्यकता अनुभव की जा रही थी जो भारतीय समाज के सर्वांगीण विकास के अनुरूप संग्रहालयों की नीति एवं कार्यक्रमों में परिवर्तन कर कुशलता से व्याख्या करने एवम् उनकी उपयोगिता का प्रतिपादन करने में उपयोगी हो सके। प्रस्तुत पुस्तक का प्रणयन इसी आशा एवं विश्वास के साथ लेखक ने किया है जो लम्बे समय तक भारतीय संग्रहालयविदों, संग्रहालय शुभेच्छुओं को, उत्पन्न नयी चुनौतियों का सामना करने हेतु समयोचित मार्गदर्शन करने में सहायक सिद्ध होंगे। विषयानुक्रमणिका : 1. विषय प्रवेश, 2. संग्रहालय और प्रचार, 3. भारतीय संग्रहालय एवं जनसम्पर्क, 4. प्रेस तथा जनसम्पर्क, 5. आकाशवाणी एवं दूरदर्शन : एक सशक्त जनसम्पर्क माध्यम, 6. फिल्म : मनोरंजक जन माध्यम, 7. संग्रहालय प्रदर्शनी, 8. संग्रहालय प्रकाशन, 9. मौखिक संचार माध्यम, 10. विविध जनसम्पर्क माध्यम एवं संग्रहालय, 11. भारतीय संग्रहालय एवं जनसम्पर्क : समस्याएँ और उपलब्धियाँ, 12. संग्रहालय विपणन।