Policekarmiyon Kee Samsayen : Samajvayjyanik Adhyayan / पुलिसकॢमयों की समस्याएँ : समाजवैज्ञानिक अध्ययन
Author
: Dr. Vijay Pratap Rai
Language
: Hindi
Book Type
: Reference Book
Publication Year
: 2000
ISBN
: 8171242561
Binding Type
: Paper Back
Bibliography
: xii + 254 Pages, Append., Size : Demy i.e. 22 x 13.5 Cm.

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भारतीय सामाजिक व्यवस्था को सुव्यवस्थित संचालित करने या करवाने की प्रत्यक्ष जिम्मेदारी तथा जवाबदेही पुलिस बल की होती है। अधिकांश जनमानस चाहे वे शहर, नगर, कस्बा अथवा ग्रामीण क्षेत्र में रहते हों पुलिस थाना ही एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ लोग अधिकांशत: पुलिस के सम्पर्क में और पुलिस लोगों के सम्पर्क में आती है। स्वतंत्रता पूर्व में पुलिस की लोगों के प्रति किसी भी प्रकार की कोई जवाबदेही नहींं थी जबकि स्वतंत्रता के बाद लोकतांत्रिक संविधान, लोकतांत्रिक सरकारें तथा समाजिक परिवर्तन के दौर में पुलिस बल से समाज को काफी अधिक अपेक्षाएँ हैं। पुलिस की उत्तरोत्तर खराब होती सामाजिक छवि पुलिस बल एवं समाज दोनों के लिए अभिशाप होता जा रहा है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की सक्रियता ने तो आम आदमी को इतना जागरूक कर दिया है कि पुलिस द्वारा किया गया विधि आचरण, संविधान विरुद्ध आचरण तथा मानवाधिकारों के उल्लंघन की छोटी-से-छोटी घटनाएँ भी पुलिस बल की सामाजिक छवि को प्रभावित कर रही हैं। पुलिस बल की नकारात्मक छवि के बारे में गहनता से अध्ययन कर यह जानने का प्रयास किया कि ऐसे वे कौन से कारक हैं जिनके कारण पुलिस बल की कार्यप्रणाली पर उत्तरोत्तर सवाल उठ रहे हैं। इनका कार्यप्रणाली तथा इनकी समस्याओं के अध्ययन से प्राप्त निष्कर्ष एवं सुझाव विस्तारपूर्वक दिये गये हैं, जो पुलिस बल के प्रभावी सुधार में अपनी रचनात्मक भूमिका अदा कर सकते हैं।