Madhyayugina Kavya Sadhana / मध्ययुगीन काव्य साधना
Author
: Ramchandra Tiwari
Language
: Hindi
Book Type
: Reference Book
Category
: Hindi Literary Criticism / History / Essays
Publication Year
: 2009
ISBN
: 9788171246915
Binding Type
: Paper Back
Bibliography
: xii + 288 Pages, Size : Demy i.e. 22.5 x 14.5 Cm.

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प्रस्ïतुत कृति में हिन्ïदी-साहित्ïय के पूर्व-मध्ïयकाल (संवतï् 1375-1700) की सीमा में आने वाले छ: कवियों—कबीर, जायसी, सूरदास, नन्ïददास, तुलसीदास और केशवदास—और उत्तर-मध्ïयकाल (संवतï् 1700-1900) की सीमा में आने वाले दो कवियों—बिहारी और घनआनंद का मूल्ïयांकन किया गया है। प्रारम्ïभ में पृष्ïठभूमि के अन्ïतर्गत मध्ïययुग के पूरे साहित्ïय को दृष्ïिट में रखते हुए तत्ïकालीन सांस्ïकृतिक चेतना की समीक्षा की गई है। हिन्ïदी-साहित्ïय के इतिहास-लेखकों ने काव्ïय-प्रवृत्ति की प्रधानता को दृष्ïिट में रखकर पूर्व-मध्ïयकाल को भक्तिकाल और उत्तर-मध्ïयकाल को रीतिकाल की संज्ञा प्रदान की है। विचार करने पर यह विभाजन उपयुक्त नहीं प्रतीत होता। यदि रीति-काव्ïय का स?ïबन्ध दरबारी संस्ïकृति से है तो स्ïवीकार करना होगा कि पूर्व-मध्ïयकाल में भी यह संस्ïकृति सशक्त थी और इसके प्रभाव में रचनाएँ लिखी जा रही थीं। इसी प्रकार उत्तर-मध्ïयकाल में भी भक्ति का प्रवाह सूख नहीं गया था। इसलिए प्रस्ïतुत कृति में लेखक ने मध्ïयकालीन हिन्ïदी-काव्ïय को रचना की प्रेरणा-भूमियों को ध्ïयान में रखकर 'राज्ïयाश्रयीÓ, 'धर्माश्रयीÓ और 'लोकाश्रयीÓ शीर्षकों के अन्ïतर्गत विभक्त किया है। प्रस्ïतुत कृति में लेखक ने काव्ïय-कृतियों के अनुशीलन के आधार पर उनमें प्रतिबिम्बित ऐसे जीवन-मूल्ïयों को प्रत्ïयक्ष करने की चेष्ïटा की है जिनसे चिपकी रहकर मध्ïययुगीन जनता अपना अस्ïितत्ïव सुरक्षित रखने में सफल हुई थी। कवियों का व्ïयक्तिगत मूल्ïयांकन करते समय लेखक ने आधुनिक समीक्षा-सिद्धान्ïतों के साथ ही उन आदर्शों को भी दृष्ïिट में रखा है जो तत्ïकालीन कवियों को निजी तौर पर मान्ïय थे। लेखक ने यथासंभव अपने मूल्ïयांकन को सन्ïतुलित, निष्ïपक्ष, विवेक-सम्मत बनाये रखने की कोशिश की है।