Eka Dalit Laraki Ki Katha / एक दलित लड़की की कथा (पाँच लम्बी कहानियों का संकलन)
Author
: Bachchan Singh
Language
: Hindi
Book Type
: General Book
Publication Year
: 2010
ISBN
: 9788171246434
Binding Type
: Hard Bound
Bibliography
: viii + 164 Pages, Size : Demy i.e. 22.5 X 14.5 Cm.

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बच्चन ङ्क्षसह की लम्बी कहानियों का तीसरा संकलन है—एक दलित लड़की की कथा। इस संकलन में पाँच कहानियाँ हैं। लक्खी काकी की आत्मकथा, जानकी, अंधेरे में पाँव, एक दलित लड़की की कथा और बदला। सभी कहानियों में दलित समाज किसी न किसी रूप में उपस्थित है लेकिन बदले हुए परिवेश और व्यक्तित्व के साथ। लक्खी काकी की आत्मकथा में लक्खी बचपन से लेकर बुढ़ापे तक फैली हुई है लेकिन वैधव्य उसका पीछा नहीं छोड़ता। जब उसकी शादी एक अधेड़ व्यक्ति से हुई तब वह शादी का मतलब भी नहीं जानती थी। यह सवाल उसे जरूर कचोटता रहता है कि गाँव में जिस तरह धूम-धड़ाके से अन्य लड़कियों की शादियाँ हुईं, ïवैसे उसकी शादी क्यों नहीं हुई? जब वह ससुराल गई तब भी शादी का अर्थ नहीं समझ पाई क्योंकि उसका पति इस लायक रह ही नहीं गया था। तो क्या लक्खी अपने बेमेल विवाह का दंश जीवन भर झेलने के लिए अभिशप्त है? कुछ ही महीने बाद उसके पति की मृत्यु हो जाती है और उसे अपनी जिन्दगी का अर्थ अपने देवर की मजबूत बाहों में दिखाई देता है। शादीशुदा देवर अपनी पत्नी को छोड़ देता है और वह शादी रचा लेती है और उसका जीवन गुलाब की तरह खिल उठता है। एक बच्चे की माँ बन जाती है लेकिन यह क्या? यह कैसा तुषारापात? क्या नियति को लक्खी की-खुशी स्वीकार नहीं है? अपने दूसरे पति की दुर्घटना में मृत्यु के बाद लक्खी बुरी तरह टूट जाती है और पति की दी हुई चिन्हाटी के साथ पूरा जीवन वैधव्य को होम कर देने का संकल्प लेती है। तीसरे व्यक्ति के साथ बैठने का विचार ही उसे भीतर तक थरथरा देता है। जीवन का हर ल?हा उसे बुढ़ापे की ओर ढकेलता जाता है और लक्खी अपने मायके में सारा जीवन भीतर के ताप में राख कर देती है। लेखक ने एक नारी के दर्द और रोमांस को सफलतापूर्वक उभारा है। कहानी का शिल्प शुरू से अंत तक पाठक को बाँधे रखता है। लक्खी के दूसरे छोर पर है जानकी जो अपने समाज की तमाम विसंगतियों से जूझते उन्हें खण्ड-खण्ड करते आगे बढ़ती है और बी०ए० प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होती है। जानकी एक ओजस्वी वक्ता है। अपने कालेज में छात्रसंघ की अध्यक्ष रह चुकी है। उसके गाँव का एक युवा नेता उसमें छिपी राजनीति की असीम संभावनाएँ देखता है और अपनी नवगठित पार्टी में उच्च ओहदा देने का भरोसा दिला कर जानकी की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ जगाता है। जानकी राजनीति को सामाजिक परिवर्तन का अच्छा माध्यम मानती है। वह मानती है कि राजनीतिक ताकत को हथियार बनाकर वह असामाजिक और आपराधिक तत्त्वों को परास्त कर सकती है। वह नेता की पार्टी में शामिल हो जाती है और थोड़े ही दिनों में लोकप्रिय हो जाती है। वह राजनीतिक जीवन की शुरुआत गाँव के ही दबंग और अपराधी व्यक्ति के खिलाफ मोर्चा खोलकर करती है जो सारा राशन चोर बाजारी में बेच देता है। नेता का मत है कि पहले पार्टी को मजबूत करो, सत्ता हासिल करो, फिर सत्ता की ताकत के सहारे असामाजिक तत्त्वों का सफाया करो। लेकिन जानकी इतनी ल?बा रास्ता तय करने का इंतजार करने के पक्ष में नहीं है और वह गाँव तथा क्षेत्र के कोटेदारों के खिलाफ जंग छेड़ देती है जिनमें गाँव का कोटेदार भी होता है। लेकिन जानकी भूल जाती है कि वह एक निहत्थी स्त्री है। एक दिन जब वह पार्टी की मीङ्क्षटग में भाग लेने शहर जा रही होती है, तभी अगवा कर ली जाती है। फिर उसका कुछ पता नहीं चलता। संकलन की अन्य कहानियाँ भी अपने-अपने ढंग से सामाजिक विद्रूपताओं पर प्रहार करती हैं। इस तरह यह संकलन पठनीय हो गया है और पाठकों को तमाम सामाजिक सन्दर्भों से रूबरू कराता है। विषय क्रम 1. लक्खी काकी की आत्मकथा / 2. जानकी / 3. अँधेरे में पाँव / 4. एक दलित लड़की की कथा / 5. बदला