Sewasadan / सेवासदन
Author
: Premchand
Language
: Hindi
Book Type
: General Book
Category
: Hindi Novels / Fiction / Stories
Publication Year
: 2013
ISBN
: 9788171249916
Binding Type
: Hard Bound
Bibliography
: viii + 208 Pages; Size : Demy i.e. 22 x 14 Cm.

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सेवासदन सामाजिक उपन्यास है। यह नारी समस्या को लेकर लिखा गया है। इसके साथ ही मध्यम वर्ग के लोगों की आर्थिक कठिनाइयों और सामाजिक बन्धनों पर प्रकाश डाला गया है। अभिजात वर्ग की आत्मविडम्बना, ढोंग और बगुला-भक्ति की पोल खोली गई है। प्रेमचंद ने यह उपन्यास भी उर्दू में लिखा था; लेकिन प्रकाशित पहले  हिन्दी में हुआ। पाठकों ने इसका खूब स्वागत किया और इसे हिन्दी जगत का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास घोषित किया। इस उपन्यास से पता चलता है कि प्रेमचंद किस तेजी से आगे बढ़ रहे थे और उनका दृष्टिकोण अब सीमित न रहकर व्यापक होता जा रहा था। उन्होंने इस उपन्यास में अबला स्त्री और मध्यम वर्ग की समस्या को लेकर समाज के लगभग समस्त पहलुओं पर प्रकाश डाला है। उपन्यास मूलत: सुधारवादी है; लेकिन प्रेमचंद ने समाज में फैली हुई बुराइयों का यथार्थ कारण ढूँढ निकाला है और उसके लिए व्यक्तियों को दोषी न ठहराकर समाज-व्यवस्था को जिम्मेदार ठहराया है। प्रेमचंद ने इस उपन्यास में विशेष रूप से वेश्याओं की समस्याओं को उठाया है। वे वेश्यावृत्ति को समाज का कलंक और कोढ़ समझते थे और इसका अन्त चाहते थे। गो उन्होंने समस्या का भावुकतापूर्ण सुधारवादी हल उपस्थित किया है और विधवाश्रम तथा सेवाश्रम इस समस्या का कोई हल नहीं हैं; लेकिन उन्होंने यह बात स्पष्ट कर दी है कि वेश्याएँ कोई विधाता की ओर से बनकर नहीं आतीं; यह निष्ठुर समाज ही हमारी बहु-बेटियों को वेश्याएँ बनने पर मजबूर करता है। इस उपन्यास से बेजोड़ शादी और दहेज की प्रथा आदि पर भी चोट पड़ती है। प्रेमचंद के पहले उपन्यासों की अपेक्षा इस उपन्यास में जितनी यथार्थवाद की मात्रा अधिक है, उतना ही चरित्र-चित्रण भी अधिक सुन्दर है। इस उपन्यास में प्रेमचंद ने भाषा और साहित्य के विषय पर भी प्रकाश डाला है। उन्हें इस बात का दु:ख है कि कुछ म्युनिसिपल कमिश्नर और पढ़े-लिखे स्वार्थी लोग खामखाह विदेशी भाषा बोलते हैं। उन्हें इस बात का भी खेद है कि कोई लेखक महाशय अंग्रेजी के एक-दो उपन्यासों अथवा पुस्तकों का, वह भी सीधे अंग्रेजी से नहीं, बंगाली या गुजराती के माध्यम से, अनुवाद करके अपने आपको तीसमारखां समझते हैं। यही कारण है कि हमारी भाषा में कोई उपन्यास नहीं है। प्रेमचंद ने 'सेवा-सदनलिखकर इस अभाव की पूर्ति की।