Nirala Aur Pragatishilata / निराला और प्रगतिशीलता
Author
: Anand Vardhan
Language
: Hindi
Book Type
: Reference Book
Publication Year
: 2016, 1st Edition
ISBN
: 9789351461142
Binding Type
: Hard Bound
Bibliography
: viii + 216 Pages; Size : Demy i.e. 22.5 x 14.5 Cm

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'निरालाÓ बीसवीं शताब्दी के उन अग्रणी काव्य हस्ताक्षरों में एक हैं जिन्होंने व्यापक रूप से अपने समय को प्रभावित किया है। प्रभावित करने की यह अद्भुत क्षमता प्रगतिशीलता का मु?य तत्त्व है। ऐसा नहीं कि पुरातनपंथियों और प्रतिगामियों ने समाज को प्रभावित नहीं किया होगा परन्तु प्रतिगामी शक्तियों के प्रभाव और प्रगतिशील प्रभाव में अन्तर है। प्रतिगामी प्रभाव खुले में स्वीकार नहीं किया जाता, न उसका प्रचार-प्रसार उदार होकर किया जाता है किन्तु एक प्रगतिकामी प्रभाव में प्रदर्शनेच्छा होती है। कुछेक आलोचकों ने 'निरालाÓ को भी संकीर्णतावादी चिन्तक के रूप में कटघरे में खड़ा किया किन्तु 'निरालाÓ नि:सन्देह संकीर्णतावादी नहीं हैं बल्कि मनुष्य के उत्कर्ष के समर्थक हैं। सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निरालाÓ का काव्य उनकी प्रगतिशीलता का सबसे बड़ा प्रमाण है। वे उच्चतर मानवीय मूल्यों के समर्थक हैं। ङ्क्षकवदंतियों की तरह फैले उनके यश में दूसरों के प्रति जो अनुराग, करुणा और प्रेम व्यक्त होता है वही उनकी व्यवहारगत प्रगतिशीलता का प्रमाण है। 'निरालाÓ ने अपने काव्य में 'लोकÓ की महत्ता प्रतिष्ठित की है। वे आने वाली सदियों को उच्चतर मानवीय मूल्यों का पक्षधर बनाने की दिशा में संलग्न दिखते हैं। डॉ० आनंद वर्धन ने अपनी इस कृति में 'निरालाÓ के उस मानवतावादी दृष्टिकोण की चर्चा की है जिसके लिए वे आजीवन संघर्षरत रहे। यह ग्रन्थ इस दृष्टि से भी अत्यन्त मौलिक है कि इसमें लेखक ने 'निरालाÓ को ऐसे प्रगतिकामी रचनाकार के रूप में देखा है जो न तो किसी वाद का पक्षधर है न ही संकीर्ण है। वे खुले मन से सारी नवीनता को स्वीकार करते हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि यह कृति 'निरालाÓ की रचनाशीलता के कुछ अनछुए पहलुओं को भी उद्घाटित करेगी। —गंगा प्रसाद विमल