Nanaki (Novel) / ननकी (ग्राम जीवन पर पड़ रहे शहरी प्रभाव पर आधारित सामाजिक उपन्यास)
Author
: Bachchan Singh 'Journalist'
Language
: Hindi
Book Type
: General Book
Publication Year
: 2001
ISBN
: 9APNANAKIP
Binding Type
: Paper Back
Bibliography
: viii + 104 Pages, Size : Demy i.e. 21.5 x 13.5 Cm.

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(ग्राम जीवन पर पड़ रहे शहरी प्रभाव पर आधारित सामाजिक उपन्यास) संवाद शैली में लिखा गया यह उपन्यास भारतीय गाँवों के अतीत, वर्तमान और भविष्य का एक सार्थक दस्तावेज है। पश्चिम की अपसंस्कृति और उपभोक्तावाद के चंगुल में फँसते जा रहे शहर किस कदर गाँवों को प्रभावित कर रहे हैं, इस तथ्य को परत-दर-परत खोलता है यह उपन्यास। अब कंक्रीट के जंगल बनते जा रहे हैं गाँव। आदमी और आदमी के बीच के रिश्ते शहरीकरण की भेंट चढ़ते जा रहे हैं। अब दूसरे की बहन-बेटी अपनी बहन-बेटी नहीं रह गई है, उपभोग की वस्तु बन गई है। गाँव की कोई लड़की सीवान में उन्मुक्त विचरण करने का साहस नहीं जुटा सकती और यदि निकल गई तो सकुशल घर वापसी मुश्किल है। गाँव समाज की जमीन दबंग लोगों के कब्जे में चली जा रही है। घटिया दर्जे की राजनीति ग्रसती जा रही है गाँव को। आपराधिक चरित्र के छुटभैये नेताओं ने ग्रा?य जीवन के सादे अंतर्स?बन्धों को तार-तार कर दिया है। गाँव की प्राणशक्ति सामूहिकता की भावना एकांगिकता में परिवॢतत होती जा रही है। पश्चिम का भौतिकवाद शहरों को लाँघता हुआ गौवों के आँगन तक पहुँच गया है जिसके चलते पवित्र रिश्ते टूट रहे हैं जिसका लाभ स्वार्थी, लोलुप और असामाजिक तत्त्व उठाने को लालायित हैं। आजादी के समय के गाँव सिर्फ स्मृतियों में रह गए हैं तथाकथित राजनीतिक चेतना ने गाँवों के गले में अपने पैने नाखून गड़ा दिये हैं जिससे गाँव धीरे-धीरे दम तोड़ते जा रहे हैं। बेशक गाँवों का विकास हुआ है और हो भी रहा है लेकिन इस विकास के केन्द्र से व्यक्ति लापता हो रहा है, निजी और सामूहिक रिश्ते खत्म हो रहे हैं, भौतिक वस्तुओं के संग्रह तथा उनके प्रदर्शन की प्रवृत्ति बढ़ रही है। यह उपन्यास गाँवों की इसी परिवर्तनशीलता को प्रस्तुत करता है-गाँवों के मुहावरों और गाँवों की भाषा में। जो लोग हिन्दी में सार्थक शब्दों के संकट का रोना रोते हैं, उन्हें यह उपन्यास अवश्य पढऩा चाहिए।