Strittva : Dharnayen Evam Yathartha (Feminity : Constructs & Reality) [PB] / स्त्रीत्व : धारणाएँ एवं यथार्थ (स्त्री-प्रश्न पर हिन्दू दृष्टिï से सभ्यतामूलक विमर्श)(पेपर बैक)
Author
: Kusumlata Kedia
  Rameshwar Prasad Mishra
Language
: Hindi
Book Type
: Reference Book
Publication Year
: 2009
ISBN
: 9788171246816
Binding Type
: Paper Back
Bibliography
: xii + 180 Pages, Biblio., Size : Demy i.e. 21.5 x 14 Cm.

MRP ₹ 120

Discount 15%

Offer Price ₹ 102

विश्व की 'एकेडमिक्सÓ यूरोईसाई सिद्धान्तों, अवधारणाओं एवं विचार-प्रत्ययों से संचालित है। आधुनिक स्त्री-विमर्श पूरी तरह पापमय, ङ्क्षहसक और सेक्स के विचित्र आतंक से पीडि़त ईसाइयत द्वारा गढ़ा गया है। गैरईसाई देशों एवं सभ्यताओं में उनके अपने ऐतिहासिक, सामाजिक एवं धाॢमक परिदृश्य में उभरी-पनपी 'स्त्रीत्वÓ की धारणा एकेडमिक बहस के बाहर है। यह पुस्तक इस यूरोकेन्द्रित पूर्वाग्रह को किसी सीमा तक संतुलित करने का प्रयास करती है, गैरईसाई सभ्यताओं में विद्यमान स्त्री-विमर्श को हिन्दू दृष्टि से सामने लाकर। यह पुस्तक बताती है: यूरोप में कैथोलिकों एवं प्रोटेस्टेन्टों ने पाँच सौ शताब्दियों तक करोड़ों निर्दोष, सदाचारिणी, भावमयी श्रेष्ठ स्त्रियों को डायनें और चुड़ैल घोषित कर जिन्दा जलाया, खौलते कड़ाहों में उबाला, पानी में डुबो कर मारा, बीच से जिन्दा चीरा, घोड़े की पूँछ में बँधवा कर सड़कों-गलियों में इस प्रकार दौड़ाया कि बँधी हुई स्त्री लहूलुहान होकर दम ही तोड़ दे! ये सभी पाप छिप-छिपा कर नहीं, सरेआम पूरे धाॢमक जोशो-खरोश से, पादरियों की आज्ञा से, पादरियों के प्रोत्साहन से और पादरियों की उपस्थिति में किये जाते थे तथा चर्चों के सामने सूचीपत्र टँगे रहते थे कि स्त्रियों को खौलते तेल में उबालने के लिए 48 फ्रैंक, घोड़े द्वारा शरीर को चार टुकड़ों में फाडऩे के लिए 30 फ्रैंक, जिन्दा गाडऩे के लिए 2 फ्रैंक, चुड़ैल करार दी गयी स्त्री को जिन्दा जलाने के लिए 28 फ्रैंक, बोरे में भरकर डुबोने के लिए 24 फ्रैंक, जीभ, कान, नाक काटने के लिए 10 फ्रैंक, तपती लाल सलाख से दागने के लिए 10 फ्रैंक, जिन्दा चमड़ी उतारने के लिए 28 फ्रैंक लगेंगे। कौन विश्वास करेगा कि ख्रीस्तीय यूरोप में सेक्स एक आतंक था और गोरे पुरुष अपनी औरतों से थरथराते काँपते डरते रहते थे कि जाने कब उसके काम-आकर्षण में फँस जाँय क्योंकि स्त्री तो शैतान का औजार है, प्रचण्ड सम्मोहक और 'ईविलÓ है। कैथोलिक पोपों के पापों से और घरों के भीतर उसकी दखलन्दाजी से घबड़ा कर प्रोटेस्टेन्ट ईसाईयों ने 'पति परमेश्वर हैÓ की धारणा रची, यह आज कितने लोग जानते हैं? ख्रीस्तपंथी यूरोप में सन् 1929 तक स्त्री को व्यक्ति नहीं माना जाता था, स्त्रियों को आँख के अलावा शेष समस्त देह को ख्रीस्तपंथ के आदेशों के अन्तर्गत ढँककर रखना अनिवार्य था और पति-पत्नी का भी समागम सोमवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार एवं रविवार के दिनों में वॢजत एवं दण्डनीय पाप घोषित था।