Antar Ke Angan Se / अन्तर के आंगन से
Author
: Shri Hareram Tripathi 'Chetan'
Language
: Hindi
Book Type
: General Book
Publication Year
: 2001
ISBN
: 8171242847
Binding Type
: Hard Bound
Bibliography
: xvi + 200 Pages, Size : 22.5 x 15 Cm.

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कवि-प्रज्ञा की सहज अभिव्यक्ति गीतों के माध्यम से ही होती है। गीतेतर काव्यरूपों में जीवन के वाह्यïार्थ की अभिव्यक्ति की सम्भावना अधिक होती है, अन्तस् का रस-चैतन्य व्यक्त नहीं हो पाता। पाठक कवि के आँगन के आलोक से अपरिचित ही रह जाता है। 'अन्तर के आँगन सेÓ में कवि के एक सौ गीत संगृहीत हैं। कवि के शब्दों में—''मैं अपने गीतों से अभिन्न हूँ। इनमें मेरा वितत अभिव्यक्त है, आनुभूतिक कांति संकुलता अनुस्यूत है। इन गीतों में मेरा अपना रंग है, अपनी जमीन है, अपनी खुशी, अपनी पीड़ा, अपनी पलकों का दुलार है, अश्रुपूर्ण स्वप्नीली आँखों में जिजीविषा की ललक है, पूर्णत्व की अभीप्सा है।ÓÓ 'कविÓ का यह 'मैंÓ संकीर्ण 'इकाईÓ नहीं वह ज्योतिर्मय चैतन्य है जिसमें जीवन और प्रकृति का सम्पूर्ण अस्तित्व आभासित होता है। इसीलिए कवि की चिन्ता मनुष्यता की मूल्यवत्ता की चिन्ता है। सत्य के साक्षात्कार की चिन्ता है। टूटते, बिखरते, सपनों को सँजोने की चिन्ता है, मनुष्य के ऊध्र्वमुखी विकास की चिन्ता है और सब मिलाकर उस जीवन राग को बनाये रखने की चिन्ता है जो जड़-चेतन में समान भाव से प्रवाहित रस चैतन्य का मूलाधार है। अनुक्रम : मातृ-भू! शत नमन, प्रकट उषा मुसकाती, आए जो क्षण लौट निमंत्रण दूँ अतीत को, सुन सकोगे तुम हमारी बात, मेरे मित्र!, जब कभी तू आदमी को केन्द्र में लोगे।