Hari Hui Ladai Ka Varis / हारी हुई लड़ाई का वारिस (ठाकुरप्रसाद ङ्क्षसह और उनका रचना कर्म)
Author
: Umesh Prasad Singh
Language
: Hindi
Book Type
: General Book
Publication Year
: 1994
ISBN
: 8171241360
Binding Type
: Hard Bound
Bibliography
: viii + 168 Pages, Append., 2 Plate, Size : Demy i.e. 22.5 x 14.5 Cm.

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ठाकुर प्रसाद ङ्क्षसह हिन्दी के उन विरल साहित्यकारों की पंक्ति में आते हैं, जिनका व्यक्तित्व बारम्बार और बराबर उनके सर्जनात्मक लेखन के मूल्यांकन में हस्तक्षेप करता रहा है। एक व्यक्ति के रूप में उनकी जीवन-यात्रा बेहद पेंचीदे और पथरीले पैंड़े से होकर गुजरने के कारण वैविध्यपूर्ण रही है। उनके मन में गाँधी के विचार-दर्शन और जीवन-मूल्यों के प्रति गहरी आस्था भी दिखाई पड़ती है और समाज परिवर्तन की साम्यवादी अवधारणा के प्रति सघन विश्वास भी झलकता है। लोक-जीवन की अभिशप्त नियति के प्रति आस्था के भावों से जुड़े रहकर प्रशासनिक सेवा में सफलता पाते रहना उनके व्यक्तित्व को अन्तॢवरोधों के दुर्भेद्यव्यूह में कैद कर देने का बहुत बड़ा कारण बन जाता है। ऊपरी तौर पर दिखाई पडऩे वाला उनके विभाजित व्यक्तित्व का यह अन्तर्विरोध मूल्यांकन को दिग्भ्रमित कर देता रहा है। जब तक ठाकुरप्रसाद ङ्क्षसह जीवित रहे, हिन्दी समीक्षा उनके रचनात्मक अवदान के प्रति संदेहशील ही बनी रही। आन्दोलनों और वादों के उथल-पुथल के दौर से गुजरती हुई हिन्दी कविता में ठाकुरप्रसाद ङ्क्षसह 'महामानवÓ की आस्थामूलक प्रबन्ध चेतना, 'वंशी और मादलÓ की आदिम लोकसंवेगों से सराबोर गीत संवेदना तथा 'हारी हुई लड़ाई लड़ते हुएÓ के विडम्बनाबोध के साथ कवि के रूप में अपनी उपस्थिति का प्रमाण देते हैं। 'कुब्जा सुन्दरीÓ और 'सात घरों का गाँवÓ तथा कुछ फुटकर कहानियाँ कथाकार के रूप में उनकी पीड़ा को अलग अंदाज में व्यक्त करती हैं। व्यक्तिव्यंजक निबन्धों में ठाकुरप्रसाद ङ्क्षसह हिन्दी गद्य की हँसमुख और बेधक शैली को अपनी समकालीन धाराओं से बिल्कुल विलग उसके मूल स्रोत से जुड़कर समृद्ध बनाते हुए मौजूद मिलते हैं। 'हारी हुई लड़ाई का वारिसÓ ठाकुरप्रसाद ङ्क्षसह की संवेदनशील चेतना और उनकी सर्जनात्मक उपलब्धियों के बीच जुड़े अन्त:सूत्रों को खोजने, जोडऩे और परखने का एक सार्थक प्रयास है। इस पुस्तक में उनके व्यक्तित्व के विविध रंगों का अन्तरंग स्पर्श आप आसानी से महसूस कर सकते हैं। उनकी सर्जनात्मक मूल्यंवत्ता को इस पुस्तक में पूर्वाग्रहमुक्त दृष्टि से ऐतिहासिक सनन्दर्भ मेंं उपलब्ध करने का संभाव्य सीमा में प्रयास किया गया है। इस पुस्तक का संपादन ठाकुरप्रसाद ङ्क्षसह के रचनात्मक सरोकारों से बरसों तक गहरा जुड़ाव रखने वाले युवा साहित्यकार उमेशप्रसाद ङ्क्षसह ने किया है, इसलिये इस पुस्तक में व्यक्तित्व के अन्त:सूत्रों को पकडऩे और रचना के आभ्यन्तरिक मूल्यों को उद्घाटित करने की प्रविधि को आसानी से देखा जा सकता है। इस पुस्तक के संपादक का यह कत्तई आग्रह नहीं है कि यह प्रयास एक रचनाकार के सृजनशील व्यक्तित्व का समग्र प्रतिबिम्ब प्रस्तुत करता है या कि इसमें उसकी सृजनशीलता के समस्त आयामों का सम्पूर्ण आकलन समाहित है। नहीं, यह पुस्तक सिर्फ एक संवेदनशील रचनाकार के आलोक वृत्त में उसके द्वारा आत्मसात किेये गए जीवन-अनुभवों की रचनात्मक उपलब्धियों को आत्मीय व्यवहार विधि से जानने-समझने की प्राथमिक पहल भर है।