Kavyashastra (Principles of Literary Criticism) [PB] / काव्यशास्त्र (काव्य के स्वरूप, तत्त्व, सिद्धान्तों और समस्याओं का प्रामाणिक विवेचन) (पेपर बैक)
Author
: Bhagirath Mishra
Language
: Hindi
Book Type
: Text Book
Publication Year
: 2018, 28th Edition
ISBN
: 9789351460381
Binding Type
: Paper Back
Bibliography
: xii + 332 Pages, Append., Index, Size : Demy i.e 21.5 x 13.5 Cm.

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काव्य हमारे संस्कार बनाता है। हमारे ?ाीतर स्नेह और मधुराई का विकास करता है। सौन्दर्य की दृष्टि प्रदान करता है। काव्यगत सौन्दर्य को जीवन में उतारकर ही हम स?यता की सीढ़ी पर चढ़ते चले जा रहे हैं। सौन्दर्य को देखकर आनन्द प्राप्त करना सहृदय का काम है और सौन्दर्य की सृष्टि और उससे प्राप्त आनन्द को सर्वसुलभ बनाना कवि का काम है। मानव-जीवन काव्य के आनन्द के बिना चल नहीं सकता। ऐसे काव्य की रचना क?ाी रुकती नहीं, पर उससे आनन्द पाने के लिए हमें कुछ ज्ञान अैर संस्कार प्राप्त करना होता है। जिस ज्ञान को प्राप्त कर कवि सुन्दर कविता कर सकता है और सहृदय काव्य का पूरा आनन्द प्राप्त करता है, वह काव्यशास्त्र। काव्य के स्वरूप को समझना और उसके तत्त्वों का विश्लेषण करना इसी का कार्य है। सहृदय काव्य की संवेदना से युक्त होते हैं और भावक काव्यशास्त्र-ज्ञान से। कवि साधारण जन की अपेक्षा भावक या आलोचक के द्वारा अपने काव्य की प्रशंसा चाहता है। संस्कृत की प्रसिद्ध उक्ति तो है ही 'अरसिकेषु कवित्व-निवेदनं शिरसि मा लिख मा लिख मा लिखÓ। अत: अरसिक न बनना पड़े, इसलिए काव्यशास्त्र का ज्ञान आवश्यक है। काव्य सौन्दर्य की सृष्टि है। कवि सौन्दर्य का द्रष्टा और स्रष्टा है। इसी कवि के द्वारा देखे और काव्यकृतियों में उतारे हुए सौन्दर्य की ओर बढ़ता-बढ़ता मानव-समाज आज स?यता के इस स्तर पर पहुँच गया है जहाँ सौन्दर्य का महत्त्व सब स्वीकार करते हैं, चाहे उससे पूर्ण एवं स्वच्छ आनन्द प्राप्त करने का अवकाश या संस्कार उनके पास न हो। अत: सौन्दर्य को अनुभूति में उतारकर सौन्दर्य को बढ़ानेवाला और अनु?ाूति को परिष्कृत करनेवाला काव्य अमृततुल्य ही है। उस अमृत-तत्व को पहचाननेवाला सहृदय ही होता है। अतएव काव्य का मर्म समझने के लिए काव्यशास्त्र का ज्ञान और संवेदना का विकास आवश्यक है। प्रस्तुत पुस्तक में काव्य के स्वरूप की मीमांसा और सिद्धान्तों का परिचय इसी उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है।