Bhakti Sudha / भक्ति-सुधा
Author
: Karpatri Ji Maharaj
Language
: Hindi
Book Type
: General Book
Category
: Adhyatmik (Spiritual & Religious) Literature
Publication Year
: 2016, 7th Edition
ISBN
: 9AGBSH
Binding Type
: Hard Bound
Bibliography
: xii + 1052 Pages, Size : Demy i.e. 24 x 16 Cm.

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भक्ति-सुधा
श्री स्वामीजी महाराज का यह अभिनव प्रस्तुत ग्रन्थ-भक्ति-सुधा-भक्तिरसार्णव का ही अनुपूरक ग्रन्थ है। दोनों में सम्बन्ध है तथा प्रार्थक्य भी है। 'भक्तिरसार्णव' भक्ति का सिद्धान्त दर्शन प्रस्तुत करता है, तो 'भक्ति-सुधा' भक्ति के व्यवहार दर्शन की निदर्शिका है। फलत: दोनों ग्रन्थों में उपकार्योपकारक भाव विद्यमान है। 'भक्ति-सुधा' का प्रथम संस्करण तीन खण्डों में प्रकाशित हुआ था। प्रस्तुत संस्करण उसी का एक खण्ड में परिष्कृत, परिवृंहित एवं परिवर्धित स्वरूप प्रस्तुत करता है। यह विपुलकाय ग्रन्थ लगभग एक हजार पृष्ठों में समाप्त हुआ है। यह परिमाणत: ही विपुल एवं अभिराम नहीं है, प्रत्युत गुणत: भी कमनीय है एवं रमणीय है। स्वामीजी का यह मौलिक ग्रन्थ उनकी तप:पूत लेखनी का नि:सन्देह अद्भुत चमत्कार है। आरम्भ के कतिपय ले, भले ही परिणाम में न्यून हों, परन्तु वे गम्भीर तत्त्वों के प्रतिपादन में सर्वथा महनीय तथा मननीय है। भक्ति-सुधा के दो-तिहाई भाग लगभग सात सौ पृष्ठ भगवान श्रीकृष्ण की वृन्दावनलीला के ही नाना रूपों का साङ्गोपाङ्ग वर्णन कर रसिक विद्वानों के सामने चिन्तन एवं मनन की विपुल नूतन सामग्री प्रस्तुत करने में समर्थ है।
यो तो 'भक्ति-सुधा' के समस्त लेख ही अभिराम एवं विचारोत्तेजक है, परन्तु वेणुगीत (105 पृष्ठ), चीरहरण (30 पृष्ठ), वेदान्तरससार (35 पृष्ठ), रासलीला रहस्य (227 पृष्ठ) एवं रासपञ्चाध्यायी (120 पृष्ठ) में वर्णित तत्त्व नितान्तहृदयावर्जक, भक्तिरसान्वित तथा परमानन्ददायक है। इन लेखों में स्वामीजी के श्रीमद्भागवत के गम्भीर अनुशीलन तथा प्रातिम ज्ञान का परिचय पदे-पदे मिलता है। लिखने की शैली बड़ी ही रोचक, आकर्षक तथा हृदयानुरञ्जक है। आध्यात्मिक तत्त्वों के विवेचन में लौकिक उदाहरणों का समावेश कर स्वामीजी महाराज गम्भीर विषयों का निरूपण इतनी सरलता से सीधी भाषा में करते हैं कि वह श्रोता तथा वक्ता के हृदय में हठात् प्रवेश कर जाता है, विषय के अन्तरङ्ग का उन्मीलन कर देता है तथा नवीन तत्तवोन्मेष से अभूतपूर्व उल्लास का सर्जन करता है। श्रीमद्भागवत के परिचित पद्यों में भी शब्दों के व्युत्पत्तिलभ्य अर्थों का निरूपण कर उनकी वाणी रहस्यमय भावों की अभिव्यक्ति करने में सफल होती है-यह लेखक की स्वानुभूति है। 'रासपञ्चाधायी' के गम्भीर भावों का इतना सरस-सुबोध विवेचन लेखक ने कहीं अन्यत्र नहीं देखा जो एक साथ ही तुलनात्मक है, विमर्शात्मक है तथा रसात्मक है। गोपियों के स्वरूप का ही इतना साङ्गोपाङ्ग सरस प्रतिपादन अन्यत्र दुर्लभ है।