Uparupakon Ka Udbhav Aur Vikas / उपरूपकों का उद्भव और विकास
Author
: Indra Chakrawal
Language
: Hindi
Book Type
: Reference Book
Category
: Sanskrit Literature
Publication Year
: 1986
ISBN
: 9VPUKUAVH
Binding Type
: Hard Bound
Bibliography
: xvi + 300 Pages, Index, Append., Size : Demy i.e. 22.5 x 14 Cm.

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प्रस्तुत प्रबन्ध सर्वप्रथम एक नये विषय को लेकर वैज्ञानिक शैली में पुरस्कृत है। इस तरह का अभी कोई ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है। विवेच्य विषय उपरूपक होने के कारण रूपकों पर संक्षेप में विचार किया गया है। इसमें रुपकों के स्वरुप को भी बतलाया गया है। रुपकों की भाँति उपरुपकों को भी बतलाया गया है। रुपकों की भाँति उपरुपकों का भी महत्त्व प्राचीन काल (भारत के पूर्व) से ही रहा है। इसमें सर्वाधिक लोकप्रिय नाटिका (उपरुपक) रही है, रुपकों की भाँति उपरुपकों के भी भेदक तत्व वस्तु, नायक और रस हैं। सामाजिक परिवेश के अनुसार इनकी संख्या घटती बढ़ती रही । मुख्य रुपकों की संख्या 19 और गौण रुपकों की संख्या 73 तक पहुँच गई है। गौण रुपकों के स्वरुपों को विभिन्न नाट्य शास्त्रियों के मतों की तुलनात्मक विवेचना करते हुए दर्शाया गया है। उपरुपकों पर लिखे गये ग्रंथों की संक्षिप्त समीक्षा की गई है। नाटिकाओं पर विशद विवेचन हुआ है। उपरूपककारों एवं उपरुपकलक्षणकारों की जीवनी एवं कृतियों पर भी विचार किया गया है। ग्रंथ के अन्त में 13 परिशिष्ट विषय का स्पष्टीकरण करते हैं। इस विषय का यह प्रथम ग्रंथ है।