Hindu Rajya Tantra (Part-2) / हिन्दू राज्य तन्त्र (भाग-2)
Author
: Kashiprasadji Jaisawal
Language
: Hindi
Book Type
: Text Book
Category
: History, Art & Culture
Publication Year
: 2012
ISBN
: 9788171248834
Binding Type
: Paper Back
Bibliography
: xvi + 184 Pages; Append; Vocabulary; Size : Demy i

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समितियों, चरणों और सभाओं के माध्यम से संचालित होने वाली वैदिक युगीन राज्य-तंत्र की व्यवस्था-यात्रा, आधुनिक भारत की संसदीय और पंचायती राज व्यवस्था तक आ पहुँची है। कहना अनुचित न होगा कि यह यात्रा भारतीय परिवेश के नवोन्मेष की यात्रा है। विश्लेषण की दृष्टि से देखें तो वैदिक युग के परवर्ती काल में लोगों की प्रवृत्ति अपने-अपने वर्ग का स्वतन्त्र शासन करने की हो चली थी। यह प्रवृत्ति वर्तमान लोकतांत्रिक राज्य व्यवस्था और आधुनिक राजनीति का विद्रूप भी है। वैसे तो विभिन्न कालखण्डों के इतिहासों को समेटे कितने ही कालजयी आ?यान हिन्दी पाठकों के बीच लोकप्रिय हुए, किन्तु स्व० काशीप्रसाद जायसवाल की 1924 ई० में प्रकाशित इस किताब को विशेष ?याति मिली। मूल पुस्तक अंग्रेजी में लिखी गयी थी। यह मूल पुस्तक का अनूदित संस्करण है। पुस्तक में लेखक ने अत्यन्त सजीव व नये दृष्टिकोण से वैदिक इतिहास की सांगोपांग झाँकी पाठकों के लिए उपस्थित की है। साम्राज्यों के उत्थान-पतन की गाथाओं से बिल्कुल अलग यह हिन्दू राज्य-तंत्र की राजा रहित शासन प्रणालियों का विस्तृत आ?यान भी है। इस पुस्तक से इस जाति के संगठनात्मक या शासन प्रणाली स?बन्धी इतिहास के एक बहुत बड़े अंश की पूॢत होती है। इस पुस्तक को पढ़कर पता चलता है कि वैदिक ग्रन्थों में वॢणत प्रजातंत्रों का हमारा इतिहास कुछ अधिक प्रयोगधर्मी, कुछ अधिक परिपक्व और कुछ अधिक सफल था। हिन्दू राजनीतिशास्त्र स?बन्धी साहित्य की रचना का आर?भ 650 ईसा पूर्व में हो चुका था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र, कामंदकीय नीतिसार तथा मेगास्थनीज के आ?यानों से होते हुए प्रस्तुत पुस्तक की रचना तक की यह यात्रा-कथा हिमालय से लेकर हिन्द महासागर के बीच बसे इस विस्तृत भारतीय भूखण्ड के राज्य-तंत्रात्मक इतिहास की प्राचीन कथा है। इस पुस्तक का प्रथम संस्करण आने के बाद से दुनिया में बहुत-सी उथल-पुथल हुई है, छोटे-बड़े अनेक परिवर्तन हुए हैं और भारत भी इस बीच आजाद हो गया है। किन्तु इतिहास का अन्वेषण करने वाले इस आ?यान की महत्ता कम नहीं हुई है। वैसे तो वैदिक काल के इतिहास पर किसी का भी कुछ भी लिखना चुनौतीपूर्ण कार्य है पर आज की दुनिया और उसके कठिन सवालों को छोड़कर बीते समय की खंगाल और वैदिक इतिहास के पन्नों से आज के समाज को रूबरू कराना लेखक का विशिष्ट पुरुषार्थ भी है। पुराना इतिहास हमें सबक सिखाता है, हिदायतें देता है और आज के अन्धकार पर नयी रोशनी डालता है। कुछ सवाल दिमाग को मथते हैं, दिमाग में बहते ऐसे विचारों को पकड़ कर कागज पर उतारने से उसके नये-नये पहलू निकलते हैं। हमारे वेदों, पुराणों और उपनिषदों में वॢणत राज्यतंत्र की नीतियाँ, बदलते समय के साथ आधुनिक होते समाज ने त्याज्य मान लीं, अन्यथा खारवेल के शिलालेखों में राज्यारोहण को शासक होने के लिए शास्त्रसम्मत विधान नहीं माना गया है। विधिवत राज्याभिषिक्त राजा ही विधिमान्य शासक कहलाता था। इसीलिए विदेशी आक्रान्ताओं को 'नैव मूद्र्धाभिषिक्तास्ते' कहकर तिरस्कृत किया गया है।