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वरिष्ठ और विशिष्ट कवि उद्भ्रान्त हिन्दी के विस्तृत आकाश में विगत आधी सदी से निरंतर चमकते एक ऐसे नक्षत्र हैं जो साहित्य की प्राय: सभी विधाओं में प्रचुर मात्रा में महत्त्वपूर्ण कार्य करते हुए अपनी मिसाल आप बनते हैं। बीसवीं सदी के गौरव, महाप्राण पंडित सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला’ के बाद संभवत: वे अकेले साहित्य मनीषी हैं जिन्होंने काव्य के समस्त रूपों—महाकाव्य, खण्डकाव्य, गीत, नवगीत, गज़ल, मुक्तक, मुक्तछंद और समकालीन यथार्थवादी कविता के साथ गद्य की विभिन्न विधाओं—कहानी, उपन्यास, निबन्ध, संस्मरण और बाल साहित्य तक में भी सफलतापूर्वक प्रभावी कलम चलाते हुए अपनी विविधवर्णी, नव-नवोन्मेषशालिनी प्रतिभा से हिन्दी के विशाल पाठक वर्ग को चकित और सम्मोहित किया है। इसी क्रम में अब हम हिन्दी पाठकों को उनके समीक्षकीय-सह-आलोचकीय रूप से भी परिचित कराते हुए यह महत्त्वपूर्ण पुस्तक प्रस्तुत कर रहे हैं—'आलोचक के भेस में’, जिसमें विगत 40-45 वर्षों की सुदीर्घ अवधि में उनके द्वारा समय-समय पर की गयी पुस्तक समीक्षाएँ और समालोचनायें शामिल हैं। साहित्यिक विमर्श में रुचि रखने वाले सुधी पाठकों के साथ-साथ लेखक के अपने वृहद पाठकवर्ग के लिए भी उनका यह नया अवतार नि:संदेह आकर्षक और विमर्शोत्सुक सिद्ध होगा। सभी पुस्तकालयों के लिए अनिवार्यरूपेण एक जरूरी किताब।