Purva Madhya Evam Madhyakalin Bhartiya Murtikala / पूर्व-मध्य एवं मध्यकालीन भारतीय मूर्तिकला
Author
: Maruti Nandan Prasad Tiwari
  Kamal Giri
Language
: Hindi
Book Type
: Text Book
Category
: History, Art & Culture
Publication Year
: 2020, Second Edition
ISBN
: 9789387643390
Binding Type
: Paper Back
Bibliography
: 282 Pages; Photo 92; Size : Demy i.e. 22 x 14 Cm.

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 पूर्व-मध्य एवं मध्यकालीन भारतीय मूर्तिकला

 ‘मध्यकालीन भारतीय मूर्तिकला’ के संशोधित परिमार्जित द्वितीय संस्करण में 7वीं शती ई० से 16वीं शती ई० के मध्य की भारतीय मूर्तिकला का क्षेत्रीय वैशिष्टय के सन्दर्भ में विस्तृत विवेचन किया गया है। इसमें विजयनगर काल की मूर्तिकला के साथ ही पिछले 30 वर्षों में प्राप्त और प्रकाशित मूर्तियों को भी समायोजित किया गया है। नवीन चित्र भी जोड़े गये हैं।
भारतीय मूर्तिकला भारत की सांस्कृतिक चेतना का प्रत्यक्ष दर्शन कराती है। चाक्षुष कला के रूप में इनमें धर्म, आस्था, सौन्दर्य, श्रृंगार, प्रहसन यानी समकालीन भारतीय जीवन की सम्पूर्णता में अभिव्यक्ति हुई है। मध्यकाल विभिन्न क्षेत्रीय राजवंशों के बीच संघर्षों और समझौतों का काल था। इस अवधि में कला के बाह्यï स्वरूप में विस्तार और परिवर्तन हुआ। राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप भारतीय मूर्तिकला में भी क्षेत्रीय तत्त्वों की प्रधानता रही है, जिसके फलस्वरूप एलोरा और एलिफैण्टा में महाप्रमाण; महाबलीपुरम् एवं तन्जौर में लम्बी, पतली और संयत कायावाली तथा खजुराहो, भुवनेश्वर, हलेबिड तथा बेलूर में अलंकरणप्रधान गतिशील मूर्तियाँ बनीं। लेखकद्वय ने विभिन्न स्थलों पर स्वयं जाकर वहाँ की मूर्तियों का बड़ी सूक्ष्मता से निरीक्षण-परीक्षण किया है और मध्यकालीन मूर्तिकला की क्षेत्रीय विशेषताओं के सन्दर्भ में महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले हैं।
प्रारम्भिक अध्यायों में मध्यकालीन भारतीय राजनीतिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में संरक्षण और मूर्तिकला की विशिष्टताओं की समग्रता और क्षेत्रीय सन्दर्भ में चर्चा की गयी है। तत्पश्चात् पल्लव, चोल, राष्ट्रकूट, चालुक्य, होयसल, पाण्ड्य, विजयनगर, गुर्जर प्रतिहार, चन्देल, कलचुरि, परमार, सोलंकी, पाल, सेन और असम की मूर्तियों का क्षेत्रीय वैशिष्ट्य के और विषय-वस्तु तथा अन्य कलात्मक विशेषताओं की दृष्टि से विस्तृत विवेचन किया गया है। अन्त में विस्तृत सन्दर्भ सूची और चित्र एवं रेखाचित्र भी दिये गये हैं।
हिन्दी या अंग्रेजी में मध्यकालीन भारतीय मूर्तिकला पर स्वतन्त्र रूप से विस्तृत ग्रन्थ का अभाव रहा है, जिससे इस पुस्तक का महत्त्व स्वत: स्पष्ट हो जाता है। पुस्तक के प्रथम संस्करण पर मिले पुरस्कार-सम्मान भी पुस्तक के महत्त्व को रेखांकित करते हैं। यह विर्दाथियों एवं सामान्य जिज्ञासु पाठकों के साथ ही शोध की दृष्टि से भी उपयोगी है।